बिजौलिया नगर पालिका चुनाव: बिना चुनाव लड़े पार्षद बनने की बढ़ी आस, 3-4 सहवृत पार्षदों के मनोनयन पर टिकी निगाहें

ललित चावला बिजौलिया | 17 Aug 2026

बिना चुनाव लड़े पार्षद बनने की बढ़ी आस, 3-4 सहवृत पार्षदों के मनोनयन पर टिकी निगाहें

बिजौलिया। नगरीय निकाय चुनाव की आहट के साथ जहां वार्डों में चुनावी समीकरण बनने लगे हैं, वहीं चेयरमैन और पार्षद बनने की चाह रखने वाले दावेदारों की सक्रियता भी बढ़ गई है। इसी बीच कुछ ऐसे लोगों की उम्मीदें भी परवान चढ़ने लगी हैं, जो चुनावी मैदान में उतरे बिना ही सहवृत यानी मनोनीत पार्षद के रूप में नगर पालिका बोर्ड का हिस्सा बनने की आस लगाए बैठे हैं।

3 से 4 सहवृत पार्षदों का हो सकता है मनोनयन

यदि बिजौलियां नगर पालिका में सहवृत पार्षदों का मनोनयन होता है तो इनकी संख्या 3 से 4 तक होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में राजनीतिक दलों से जुड़े कई चेहरों के साथ सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोगों की नजरें इस मनोनयन पर टिकी हैं। येमनोनयन हुआ तो 3-4 चेहरे बन सकते हैं बोर्ड का हिस्सा

जानकारी के अनुसार सगजहवृत या मनोनीत पार्षदों का चयन राजस्थान सरकार के स्वायत्त शासन विभाग की ओर से जारी नियमों और अधिसूचना के आधार पर किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में विशेष योग्यता, अनुभव और प्रतिभा रखने वाले लोगों को इसमें स्थान दिया जा सकता है। इसके अलावा दिव्यांगजन को भी प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था में प्राथमिकता रहती है। सेवानिवृत्त अधिकारी या संबंधित क्षेत्र में अनुभव रखने वाले व्यक्ति भी इसके लिए योग्य हो सकते हैं।

हालांकि स्थानीय निकायों में अब तक के अनुभव को देखें तो सहवृत पार्षदों के पद पर राजनीतिक और दलीय निष्ठा रखने वाले लोगों को जगह मिलने की चर्चाएं भी आम रही हैं। यही कारण है कि नगर पालिका चुनाव से पहले ही संभावित मनोनीत पार्षदों को लेकर राजनीतिक हलकों में जोड़-तोड़ और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

विधायक की अनुशंसा की भी रहेगी अहम भूमिका

स्थानीय जानकारों का कहना है कि सहवृत पार्षदों के मनोनयन में क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विधायक की अनुशंसा से ऐसे नाम आगे बढ़ने की संभावना रहती है, जिसके चलते कई दावेदार अभी से अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने में जुटे हैं। मनोनीत पार्षद नगर पालिका बोर्ड की बैठकों में शामिल होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं, लेकिन निर्वाचित पार्षदों की तरह किसी वार्ड का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उनके पास किसी विशेष वार्ड का विकास बजट या वार्ड स्तर की जिम्मेदारी भी नहीं होती। इसी तरह बोर्ड के निर्णयों में उनकी भूमिका नियमों के दायरे में सीमित रहती है।

'बिना नाखून का शेर' जैसी स्थिति

सहवृत पार्षद बनने की सबसे बड़ी खासियत यह है कि संबंधित व्यक्ति को चुनावी मुकाबले में उतरे बिना नगर पालिका बोर्ड में जगह मिल सकती है। हालांकि अधिकारों की बात करें तो निर्वाचित पार्षदों की तुलना में उनकी भूमिका सीमित रहती है। न किसी वार्ड का सीधा प्रतिनिधित्व, न वार्ड का बजट और न ही निर्वाचित पार्षद जैसी राजनीतिक ताकत।
यही वजह है कि स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में ऐसे मनोनीत पार्षदों की स्थिति को 'बिना नाखून का शेर' जैसी उपमा भी दी जा रही है। पद और पहचान तो मिलेगी, लेकिन अधिकारों का दायरा सीमित रहेगा। अब देखना यह होगा कि बिजौलियां नगर पालिका में सहवृत पार्षदों का मनोनयन होता है या नहीं और यदि होता है तो किन चेहरों को बोर्ड में जगह मिलती है।

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